कल काशी में मसान की होली का आयोजन होगा, जो एक अत्यंत विशिष्ट परंपरा है। इस दिन शहर की सड़कों पर श्मशान की राख बिखरी रहती है और लोग होली का उत्सव मनाने के लिए इसे इस्तेमाल करते हैं। यहाँ रंगों के बजाय राख और भस्म से होली खेली जाती है। कुछ लोग अपने चेहरे पर राख लगाते हैं, जबकि कुछ चिता की भस्म में खुद को डुबोकर इस अनुभव का हिस्सा बनते हैं। इस दिन लोग गले में नर कंकाल पहनकर या रुद्राक्ष की माला की तरह हिलते हुए शवों का प्रतीक सम्मान करते हैं। कुछ लोग जीवित सांपों के साथ नृत्य करते हैं, जो इस उत्सव को और भी रहस्यमय बना देते हैं। काशी में जलती चिता की राख से होली खेलने का यह तरीका जीवन और मृत्यु के बीच के रिश्ते को दर्शाता है, जिसमें मृत्यु भी जीवन का अविभाज्य हिस्सा मानी जाती है। लोग घंटों तक एक चुटकी भस्म पाने के लिए इंतजार करते हैं। यह परंपरा काशी की अद्वितीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करती है, जिसमें मृत्यु के प्रति श्रद्धा और जीवन के चक्र को स्वीकार किया जाता है।Yesterday people played Holi with the ashes of the crematorium

काशी की महाश्मशान रंगभरी एकादशी, जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है, एक अद्वितीय परंपरा का हिस्सा है। इस दिन हरिश्चंद्र घाट पर चिता की राख से होली खेलने की विशेष रीति है। काशी के महाश्मशान में चौबीसों घंटे चिता जलती रहती है और कहा जाता है कि यहां कभी भी चिता की आग ठंडी नहीं होती। सामान्यतः यहां के लोग मायूस रहते हैं, क्योंकि यह स्थान मृत्यु का प्रतीक है, लेकिन होली के दिन इस माहौल में खुशियों का संचार होता है। लोग इस दिन राख से होली खेलते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं। यह परंपरा काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक धारा को दर्शाती है, जहां जीवन और मृत्यु के चक्र को मानते हुए हर स्थिति में खुशी मनाने की कला को सम्मानित किया जाता है। अब सवाल उठता है कि यह अनोखी परंपरा कैसे शुरू हुई? Yesterday people played Holi with the ashes of the crematorium

काशी की महाश्मशान रंगभरी एकादशी, जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है, एक अद्वितीय परंपरा का हिस्सा है। इस दिन हरिश्चंद्र घाट पर चिता की राख से होली खेलने की विशेष रीति है। काशी के महाश्मशान में चौबीसों घंटे चिता जलती रहती है और कहा जाता है कि यहां कभी भी चिता की आग ठंडी नहीं होती। सामान्यतः यहां के लोग मायूस रहते हैं, क्योंकि यह स्थान मृत्यु का प्रतीक है, लेकिन होली के दिन इस माहौल में खुशियों का संचार होता है। लोग इस दिन राख से होली खेलते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं। यह परंपरा काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक धारा को दर्शाती है, जहां जीवन और मृत्यु के चक्र को मानते हुए हर स्थिति में खुशी मनाने की कला को सम्मानित किया जाता है। अब सवाल उठता है कि यह अनोखी परंपरा कैसे शुरू हुई?







