नागा साधु दो विशेष अखाड़ों में निवास करते हैं: एक है वाराणसी का महापरिनिर्वाण अखाड़ा और दूसरा है पंच दशनाम जूना अखाड़ा। ये दोनों अखाड़े कुंभ के दौरान अपने नागा साधुओं को भेजते हैं, जो इस धार्मिक उत्सव का हिस्सा बनते हैं। इन साधुओं की उपस्थिति कुंभ की विशेषता होती है और यह अखाड़े साधना, ध्यान और धार्मिक अनुशासन के प्रतीक माने जाते हैं
हाथों में त्रिशूल, शरीर पर भस्म, रुद्राक्ष की माला और कभी-कभी जानवरों की खाल लपेटे हुए ये साधु कुंभ मेले में आते हैं। कुंभ का पहला शाही स्नान नागा साधु करते हैं, जो उनकी आध्यात्मिक महिमा और तपस्या का प्रतीक होता है। इसके बाद ही अन्य श्रद्धालुओं को कुंभ स्नान की अनुमति मिलती है। ये साधु अपने कठोर साधना और तप के लिए प्रसिद्ध होते हैं और उनका कुंभ में स्नान एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, जो अन्य भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।
नागा साधुओं का मानना है कि धरती उनका बिछौना और अम्बर उनका ओढ़ना है. इसीलिए वे कुंभ की अमृत वर्षा के लिए नागा स्वरूप में आते हैं

नागा परंपरा
कुंभ में जूना अखाड़ा के थानापति घनानंद गिरी बताते हैं कि नागा साधु बनने के लिए व्यक्ति को संत समाज और शंकराचार्य से विशेष उपाधि प्राप्त करनी होती है। इस उपाधि के बाद ही उसे नागा रहने की अनुमति मिलती है। नागा साधु अपने जीवन में कठोर तप और अनुशासन का पालन करते हैं। उनका जीवन साधना, तपस्या और विरक्तता से भरपूर होता है। ये साधु अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति के माध्यम से समाज को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। कुंभ मेला उनके लिए अपने तप और साधना का प्रदर्शन करने का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है।







