जेल की तंग कोठरी में, चार दीवारों के बीच सन्नाटा था। एक आदमी बैठा था, जिसका नाम कभी आकाश की ऊँचाइयों तक पहुँच चुका था। वह नरेश गोयल था, जो एक समय जेट एयरवेज का किंग कहलाता था। उसकी कहानी ऐसी थी, जो हर किसी की जुबां पर थी। उसकी दौलत, प्रतिष्ठा, और ताकत ने उसे राजा से भी ऊपर बना दिया था। लोग उसे देखकर कहते थे, “यह आदमी कभी नहीं गिर सकता।”

लेकिन अब? अब वह वही आदमी था, जो अंधेरे में अपनी ज़िंदगी की बचे खुचे दिनों को गिन रहा था। उसकी आँखों में अब न कोई उम्मीद थी, न कोई ख्वाब। बस, एक गहरी खामोशी थी, और उसकी जुबां पर सिर्फ यही शब्द थे— “जेल में मर जाना बेहतर लगता है।”
उसके चेहरे पर निराशा का एक गहरा साया था। यादें ताज़ा हो रही थीं—वह समय जब वह आकाश में उड़ता था, जब जेट एयरवेज की कामयाबी उसकी मुट्ठी में थी। लेकिन अब यह सब खत्म हो चुका था। हर कदम जो उसने अपनी सफलता के रास्ते पर उठाया था, वह अब उसे भंवर में घसीट ले आया था।
उसने सर्दी में कांपते हुए खुद से कहा, “मेरी ज़िंदगी कभी उस ऊँचाई तक नहीं पहुंची, जहाँ घमंड करने का हक था। अब मैं समझ चुका हूँ—समय का पहिया चलता रहता है, और जो आज ऊपर है, वह कल नीचे गिर सकता है।”

वह अब इस जाल में उलझ चुका था, जिसे कभी अपनी ताकत समझा था। वह हर रोज़ सोचता, “कभी किसी को अपने धन, प्रसिद्धि और ताकत पर घमंड नहीं करना चाहिए। समय की धार कहीं से भी पलट सकती है।”
अब नरेश गोयल के पास सिर्फ एक सवाल था—क्या वह अपने अंधेरे अतीत को स्वीकार करेगा, या फिर इस जेल में ही उसका अंत हो जाएगा?







